Thursday, January 6, 2011

हत्या,सच और न्याय

बिहार में भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या के बाद इस पूरे मामले की जो सूरत गढ़ी गई, वह कई गंभीर सवाल खड़े करती है | तब जबकि एक तरफ राज्य सरकार ने मामले को संगीन बताया और फौरी तौर पर इसके जाँच के आदेश दिए, यह बात सरकार में शामिल लोगों की तरफ से बढ़-चढ़कर बताना कि केसरी क्षेत्र में काफी लोकप्रिय थे और उन्हें पूर्णिया की जनता ने चार बार विधायक चुनकर भेजा था, लिहाजा अगर किसी का चरित्र संदिग्थ है तो उस महिला का जिसने विधायक की चाकू घोंपकर हत्या की ये बातें कहीं से भी गले से नहीं उतरती है | केसरी चूँकि भाजपा विधायक थे, इसीलिए इस घटना के बाद राज्य में सतारूढ़ जदयू-भाजपा गठबंधन में सबसे मुश्किल स्तिथि जाहिर रूप से भाजपा की ही बनी | उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की इस घटना के बाद अतिरिक्त सक्रियता और कुछ घंटे के अन्दर ही मीडिया के सामने यह कह देना कि महिला के विधायक पर यौन उत्पीडन के आरोप गंभीर नहीं हैं | इस आरोप को लेकर न तो कोई मामला लंबित है और न ही किसी स्तर पर कोई लिखित शिकायत दर्ज है | केसरी जनप्रिय नेता थे और भाजपा के साथ उनका साथ पुराना और विश्वसनीय था | किसी सूबे की सरकार में वरीयता में दूसरे नंबर की जवाबदेही संभाल रहे नेता का इस तरह का बयान कम से कम एक तटस्थ प्रतिक्रिया तो नहीं ही कही जा सकती | जदयू-भाजपा गंठबंधन को सूबे की जनता ने जब शासन के लिए दोबारा चुना तो उसके पीछे एक बड़ी आशा राज्य में सुशासन की स्थापना भी थी | बेशक निजी रूप से मुख्यमंत्री नितीश कुमार सत्ता में रहते हुए अपने बयान और क्रियाकलाप में अपेक्षित रूप से कम विवादास्पद रहे हैं | लेकिन विधायक हत्या मामले में सरकार और उसमे शामिल एक दल की छवि दांव पर लगी है | न्याय की यह सार्वदेशिक और सार्वकालिन मर्यादा  है कि न्याय होने से ज्यादा जरूरी है कि न्याय होते हुए भी दिखे | इस मामले में कम से कम अब तक के घटनाक्रम में तो न्याय की यह मर्यादा पूरी होती नहीं दिखती | सरकार और उनके लोगों की छवि और सुरक्षा अगर बहुत मायने रखती है तो यह कहीं से सिद्ध नहीं होता कि यह सब नागरिक सुरक्षा और खासकर एक महिला कि छवि को बगैर किसी पुष्ट आधार के दाव पर लगाकर ही पूरा हो | वैसे भी जनतांत्रिक मर्यादा किसी सरकार और उनके हिस्से-पुर्जों को जनता के प्रति ही अंतिम रूप से उत्तरदायी ठहराती है | लिहाजा, केसरी हत्याकांड की जब तक जाँच पूरी नहीं हो जाती तब तक सरकारी पक्ष तटस्थ मर्यादा का सख्ती से पालन करे, यह चुनौती भी है और यही अपेक्षित भी | जिस तरह यह हत्या हुई, उसमे कम से कम पहली नजर में तो यह लगता है कि इसके पीछे की वजह मामूली नहीं होगी |   

2 comments:

  1. hmare desh m sdew se hi mahilao ko dabaya gya hai or purush pradhan is desh me mahilao ka sath dene wale bahot hi kam hai aap bhi ek mahila hai is karan aap unke sath hai nhi to bahot hi kam dekhagya h ki is mudde ko sayad hi thik se kisi purus ne uthaya hoga

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  2. ye aarop pratyarop ka khel netao se jada ye media wale khelte hai ye apni khabar k liye kuch v kar sakte hai aap ka lekh kabile tarif hai m is bat ko bilkul nhi nkaruga

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