Thursday, December 30, 2010
ऐसे में कौन उनकी बात सुनेगा
कुछ सालों पहले तक यह धारणा थी कि देश में सक्रिय तमाम गैर-सरकारी संगठन(एनजीओ) जनता से जुड़े मुद्दों की गहराई से पड़ताल करते हैं और यथासंभव उस संदर्भ में सार्थक कार्य करते है| इस प्रक्रिया में वे खुद तो समस्या के समाधान की कोशिश करते ही है, अपने सर्वेक्षणों, अध्ययनों और शोधों से सरकार को भी सुझाव देते रहते हैं कि उसे किस तरह के कार्यक्रम शुरू करने चाहिए| उस दौरान यह भी देखा जाता था कि कुछ गंभीर बोद्धिक लोग इन संगठनों से जुड़े रहते थे और समस्या के विभिन्न पहलुओं का उपयोगी विशलेषण प्रस्तुत करते थे| लेकिन जैसे तमाम सरकारी संस्थाओं की भूमिका और छवि बदलती गई है, वैसे ही एनजीओ की छवि भी अब बदल चुकी है| ऐसा नहीं कि देश के सभी एनजीओ किसी गड़बड़ी के शिकार हैं, लेकिन अधिकांश की रिपोर्ट चिंताजनक है| अब ताजा समाचार यह है कि देश के ८७ एनजीओ पैसे की हेराफेरी के मामलें में फंस गए है| इनमें से ४६ के खाते सील भी कर दिए गए हैं| गौरतलब है कि देश के तमाम एनजीओ ऐसे हैं, जिन्हें विदेशों से सहायता राशि प्राप्त होती है| इन पैसों के उपयोग को लेकर सवाल उठते रहते है| अब जाँच के बाद इस धन के दुरुप्रयोग की पुष्टि वास्तव में चिंताजनक मसला है| एनजीओ आदर्श व सिद्धांत की बातें करते थकते नहीं| ऐसे में उनका अपना दमन ही दागदार हो, तो फिर कौन उनकी बातों को गंम्भीरता से लेगा| ऐसे में शेष संगठनों को इससे सबक लेते हुए अपने कार्यों में पारदशिर्ता लाने की जरूरत कोशिश करनी चाहिए|
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desh me har char aadami ke liye ek n.g.o. hai yaha tk ki bihar ke ek vyakti ke pass to thin n.g.o. the jisne ek n.g.o. apni beti ki shadi me dahej me dediya. is bat se andaja lgaya ja sakta hai ki ye n.g.o. ek jariya ban gya hai kmai ka ese me ye kya sunege hmari jb khud ki jeb bhar jaigi to sayd kuch sun le hmari tb tk hme usska intjar karna hoga
ReplyDeleteAaj inhi chand bhrasht NGO ki wajah se un tamam NGO's ko bhi shak ki nigah se dekha jaane laga hai.aajkal NGO's ko 'choro ka giroh' bhi kaha jane laga hai. aise me NGO ko lekar pardarshita aur inke account ka sara byora janta ke samaksh ek niyamit antaral ke ander pesh kiya jana chahiye.
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